*यकृत एवं पित्ताशय की पथरी*

बादाम गिरी 6 नग,मुनकका 6 नग,मगज खरबूजा 4 ग्राम ,छोटी इलायची 2 नग,मिश्री 10 ग्राम-इन पांचों को ठंडाई
की तरह बारीक घोंटकर आधा कप छानकर देने से पित्ताशय की पथरी मे चमत्कारी लाभ मिलता
है जबकि निम्नलिखित लक्षण रहे -यकृत के नीचे दर्द हो साथ मे उलटी होने पर फिर
कुछ आराम मिले ।
विशेष -
पित्त पथरी कैसे बनती है :- पित्ताशय यकृत (लीवर ) के नीचे
स्थित होता है और इसी मे पित्त (पाचक पित्त ) जमा होता है ,जहा से वह छोटी आंत मे जाकर
पाचन क्रिया मे सहायता करता है । पित्ताशय मे पित्त पथरी निर्माण करने
वाले कोलेस्ट्राल (चर्बी) का संचय भी होता है ।यह कोलेस्ट्राल
पित्ताशय मे जमा पित्त मे घुलनशील होता है परंतु कई बार स्थायी कब्ज,अम्लता,अनियमित,असंतुलित और जल्दी न पचने
वाला भोजन ,मधपान,मांसाहार आदि के
परिणामस्वरूप पाचन क्रिया मंद हो जाने के कारण पित्ताशय मे
कोलेस्ट्राल नही घुल पाता तो संचित होकर दूषित द्रव्यों के संयोग से पथरी का
रूप धारण कर लेता है जिसे पित्त पथरी (Gall stone ) कहते है । शुरूआत मे पथरी
बालू के कण की आकृति से दूषित पदार्थों के संयोग से क्रमशः बढकर बडे आकार की
हो जाती है ।छोटे आकार की पथरियां पित्तनली (common bile duct) की राह से निकलकर आंतों मे
प्रवेश कर जाती है और रोगी को इनके होने का पता ही नही चलता परंतु बडे आकार
की पथरिया जब पित्त नली के अंदर प्रवेश करती है तो भयानक कष्ट होता है और जब
तक ये पथरिया साधारण पित्त प्रणाली के रास्ते से हट नही जाती तब तक यह भयानक दर्द
होता रहता है जो पित्त पथरी शूल (Gall stone colic ) कहलाता है ।
लक्षण :- शुरूआत मे रोगी को भोजन के बाद पित्ताशय के आसपास बेचैनी सी
महसूस होती है । फिर पेट मे दर्द नाभि के ऊपर या दाहिनी ओर नीचे की तरफ
पित्ताशय के आसपास मालूम होता है जो हलका होता है जो प्रायः खाना खाने के बाद
शुरू होता है और उलटी होने के बाद ही कुछ आराम मिलता है । रोग अधिक
पुराना होने पर खाने मे अरूचि होने लगती है और पेट का दर्द भी बढ जाता है । पथरी
बडी होने पर दर्द पेट के पूरे हिस्से मे होने लगता है और कभी कभी दाहिने
कंधे तक बढ जाता है । य। दरद ऐंठन जैसा तेज होता है जो अचानक आरंभ होता है तथा कुछ
घंटो तक बना रहता है । तेज दर्द मे उल्टियाँ भी हो सकती है ।पथरी के
पित्त नली मे अटक जाने से कई बार सिर मे चक्कर और तेज बुखार भी आ सकता है
।सोनोगराफी के द्वारा पथरियो की संख्या और स्थिति का पता चल जाता है ।
पथरी से बचने के उपाय :- चाहे पित्ताशय की पथरी हो या गुर्दे
की सभी पथरियों की उत्पत्ति कि संबध स्त्राव की ग्रंथियों
(Secretion Glands ) की
क्रियाशीलता से होता है । जब गलत आहार विहार जन्य वात पित्त कफ दोष बढ़ने के
कारण शरीर की पाचन प्रणाली और स्त्रावक प्रणाली (Secretion System) का कार्य सुचारू रूप से नही
होता तब दूषित पदार्थ मूत्रादि मे घुलकर निकलने की बजाय गुर्दे या
पित्ताशय मे संचित होकर मूत्रपथरी या पित्त पथरी का रूप ग्रहण कर लेते है । अतः
खानपान सुधारने तथा रितु के अनुसार आयुर्वेदिक तरीके से विरेचन आदि षटकरम
से शरीर का शोधन करते रहना चाहिए । इससे पथरी होने का डर नही रहता ।
पित्त पथरी के पथ्यापथ्य:- पित्त पथरी मे पथ्या
पथ्य पालन करने का विशेष महत्व है ।
पथ्य -जौ,मूंग की
छिलके वाली दाल ,चावल,परवल,तुरई,लौकी,करेला,मौसममी,अनार,आंवला,मुनकका,ग्वारपाठा,जैतून का तेल आदि । भोजन
सादा,बिना घी
तेल वाला तथा आसानी से पचने वाला करे और योगाभ्यास करे ।
अपथ्य :- मांसाहार ,शराब आदि
नशीले पदारथो का सेवन,उड़द,गेहूं,पनीर,दूध की मिठाइयाँ,नमकीन,तीखे,मसालेदार,तले हुए ,खट्टे खमीर उठाकर बनाए गए
खाध पदार्थ जैसे इंडली,डोसा,ढोकला आदि ।अधिक
चर्बी,मसाले
एवं प्रोटीन के सेवन से यकृत एवं प्लीहा के खराब होने की संभावना बढ
जाती है और फलस्वरूप रकत की शुद्धि नही हो पाती । अतः पाचन मे
भारी खासकर तली हुई और अम्ल बढ़ाने वाली चीजों के सेवन से परहेज रखे और भूख के
बिना भोजन न करे ।
धन्यवाद
हेमन्त कुमार शर्मा
(साभार-डा.
अजीत मेहता/स्वदेशी चिकित्सा सार)
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